Friday, 21 October 2016

बुद्ध धम्म हिंदु धर्मका ही हिस्सा - एक बहोत बडा सफेद झूठ

�� *_बुद्ध धम्म हिंदु धर्मका ही हिस्सा - एक बहोत बडा सफेद झूठ_*

�� *लेखांक -१*

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        बौद्ध धम्म हिंदु धर्म का हिस्सा है, या पंथ है ऐसा कुछ नासमझ लोग कहते है। लेकीन ये बहोत बडा सफेद झूठ है। सबसे पहले तो बौद्ध धम्म कोई धर्म नही है, बल्की  एक जीवन जिने की कला है, जो दुःख के मुलभुत कारण सभी प्रकारकी 'तृष्णा' से मुक्ती का मार्ग सिखाकर आपको इसी जन्म मे मोक्ष दिलाती है। बौद्ध धम्म का तत्वज्ञान हिंदु धर्म के तत्वज्ञानसे मूलतः भिन्न है।

*_उसमेसे कुछ महत्त्वपूर्ण भेद :-_*

*१.* हिंदु धर्म आत्मा के अस्तित्व को मानता है।
➖ बौद्ध धम्म 'अनात्म' तत्व को मानता है, मतलब आत्मा का अस्तित्व नही होता यह मानता है।

*२.* हिंदु धर्म परमात्मा - ईश्वर के अस्तित्व के तत्वको मानता है। उसमे अगणित देवी-देवता है, जैसे ब्रम्हा, विष्णु, शंकर, राम, श्रीकृष्ण, इंद्र ई.। ऐसे कुछ ३३ करोड देवी देवता है ऐसा वो बताते है।
➖ लेकीन भगवान बुद्ध खुदको ईश्वर या परमात्मा नही मानते, बौद्धजन उन्हे महामानव या महापुरुष मानते है।

*३.* हिंदु धर्म मे समाजव्यवस्था चातुर्वर्ण पर आधारीत है। समाज का विभाजन जन्मतः ही ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र इन चार वर्णों में किया जाता है और इसे ये लोग ईश्वरकृत समझते है। उनके धर्म के अनुसार मनुष्य जन्मतः ही उच या नीच होता है।
*चातुर्वर्ण मया सृष्टयं गुणकर्म विभागश:*
ऐसा श्रीकृष्णके भगवद्गीता का वचन प्रसिद्ध है। उसमे ब्राम्हण को सबसे ऊपर का स्थान दिया गया है, शुद्र को बाकी तीन वर्णों के लोगो की सेवा करने की आज्ञा की गयी है। यह मानव मानव मे भेद करता है और एक होने के लिए- समानता प्रस्थापित करने के लिए कोई विकल्प नही छोडता।
➖ लेकीन बौद्ध धम्म दुनिया के सर्व मानवों को समान मानता है ; जिसमे वर्ण भेद जातीभेद या मानव मानव को अलग करनेवाले कोई भी भेद नही है।

*4.* हिंदु धर्म मे आत्मा को सनातन याने अजर, अमर, अविनाशी मानते है।
➖ लेकीन बौद्ध धम्म मे हर एक चीज को 'अनित्य' ( impermanent) मानते है। सृष्टी का चक्र निरंतर चलता रहता है और उसमे हर क्षण निरंतर बदल होते रहते है, ऐसी बौद्ध धम्म की तत्वप्रणाली है।

*५.* हिंदु धर्मानुसार दुःख का कारण दैववाद ( नसीब का लिखा हुआ ) होता है और जिनके दैवमे दुःख होता है उसे वो निश्चित मिलता है ऐसा कहते है।
➖ लेकीन बौद्ध धम्मने दुनिया मे दुःख का अस्तित्व मान्य कर दुःख की उत्पत्ती के कारणों का गहराई से अभ्यास कर संशोधन किया है ; और उसे मिटाया जाता है यह सिखाकर स्पष्ट रूप से दुःखो से मुक्ती का मार्ग भी बताया है।

*६.* हिंदुंओके दैववाद के अनुसार मानवको मिलने वाले दुःख या उनके हिस्से में आनेवाले सुख उनके दैव गतीनुसार उसे मिलेगा ही ऐसा बताया जाता है। जीव जब जन्म लेता है तब उसके जन्म से मृत्यु तक के उसके कर्म और उसकी गती ( परीणाम) उसके जन्म के पहलेसे ही लिखे हुए होते है और वे सब घटता ही है ऐसा कहा जाता है। यह दैव गती कोई कोई टाल नही सकता ऐसा हिंदु धर्म मे स्पष्ट रूप से विशद किया हुआ है।
➖ लेकीन बौद्धोंका कर्मवाद इसके बहोत विपरीत है। मनुष्य जैसे कर्म करेगा, वैसे फल उसे मिलेगा ही, ऐसा स्पष्ट रूप से बताया गया है। धम्मपद के प्रथम और द्वितीय गाथाओंमे यह अत्यंत स्पष्ट रूप से बताया है। इसीलिए हिन्दूओ का कर्मवाद और बौद्धोंका कर्मवाद दोनोही तत्वज्ञान एक दुसरेसे बहोत ही विरुद्ध है। दैववाद पर भरोसा ना करकर मनुष्य ने कुशल कर्म करते रहना चाहिए ऐसा बौद्ध धम्म मे स्पष्ठ रूप से कहा है।

*७.* बौद्धोंका कर्मवाद विज्ञानसे ( Science ) सुसंगत है। 'जैसा करोगे वैसा भरोगे' ईस सिद्धांतपर और कार्यकारण भाव पर ( Cause & effect ) आधारीत है। अच्छी भावना मन मे रखकर कोई भी कुशल कर्म किया तो सुख आज नही तो कल मिलेगाही। और वैसेही मन में दुष्ट भावना रखकर अकुशल कर्म किया तो, दुःख आपका, अपने खुद के छाव की तरह पीछा नही छोडेगा ऐसा स्पष्ट कहा गया है। हिंदुओंका कर्मवाद दैववाद ( लिखीत नसीब ) पर आधारीत है।

*८.* हिंदु धर्मोके धर्मग्रंथ मे उनके देवी- देवताओं ने किये हुए अनेक अनैतिक कर्म नमूद है। इंद्रदेव ने भेस बदलकर एक ऋषीपत्नी पर ( अहिल्या) बलात्कार किया है। ब्रम्हा, विष्णु और महेश ईन तीनो देवाधीदेवोने एक ऋषीपत्नीको ( सती अनुसया), " तू नग्न होकर हमें भिक्षा दे" ऐसा आग्रह किया है, जिससे उसका पावित्र्य भंग हो जाये और उसे सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती इनसे कम माना जाए ( संदर्भ :- श्री दत्त जन्म की कथा)। विष्णु देवने ब्राम्हण का रूप धारण कर उसे दान देने वाले बळीराजाको पाँव के निचे कुचल दिया। ऐसी शेकडो घृणित कथाये है। ➖ परंतु भगवान बुद्ध का चारित्र्य अत्यंत निर्दोष और सत्य मार्ग पर सतशील है।

*९.* हिंदु धर्म मे यज्ञ मे पशु बली को मान्यता है।
➖ परंतु बौद्ध धम्म मे धम्म के नामसे पशु हत्या निषिद्ध है।

( *पाणातिपाता वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।* )
अर्थ :- मै प्राणहिंसा नही करूँगा ऐसा व्रत मै धारण करता हु।

क्रमशः

��✒ *अविनाश पवार*
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